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Tuesday, August 6, 2013
Wednesday, December 26, 2012
‘उगना’--डॉ लक्ष्मीकांत चौधरी ‘सजल’
बिहार के मिथिलांचल का एक गाँव है – बिस्फी
वर्तमान में यह गाँव मधुबनी जिला में है| इसी गाँव के थे विद्यापति| महाकवि विद्यापति दरभंगा राज के राजकवि थे| राजकवि का ओहदा मिला था कर्णप्रिय गीतों की वजह से| गीतों की लोकप्रियता की वजह से उन्हें ‘कवि कोकिल ’ की उपाधि भी मिली थी| उनके श्रृंगार और भक्तिरस के गीत आज भी मिथिलांचल में घर-घर में गाए जाते हैं|शादी विवाह जैसे शुभ अवसरों से लेकर मंदिरों तक में उन्हीं के गीत गूँजते हैं|
एक दिन की बात है, गोधुलि बेला थी| विद्यापति एक गीत की रचना में तल्लीन थे| रचना पूरी हुई तो उसे गाने लगे| गाते-गाते इतने तन्मय हो गए कि कि आँखें खुद-ब-खुद मुँद गईं| स्वर में ऐसा जादू था, मानो करुणा का सागर उमड़ पड़ा हो| वे गा रहे थे-
कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ
कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ|
दुःखहिं जनम भेल, दुःख ही गमाओल
सुख सपनेहुँ नहिं भेल हे भोलानाथ
सुख सपनेहुँ नहिं भेल हे भोलानाथ
कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ|...
गीत अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि उन्हें लगा कि कोई उनके चरणों में बैठा है| आँखें खोलीं तो देखा एक किशोर है| उन्होंने उसे उठाते हुए पूछा-
‘क्या नाम है तुम्हारा?’
जवाब में किशोर ने कहा-
‘जिस नाम से पुकार लीजिए’
विद्यापति ने उसे नाम दिया – ‘उगना’
उगना अब विद्यापति के साथ ही रहने लगा, उन्हीं के घर, घर परिवार के दूसरे सदस्यों की तरह ही|
एक दिन विद्यापति को राजदरबार जाना था| साथ में उगना भी था| जेठ का महीना था| धूप काफी तेज थी| दोनो पसीने से तरबतर थे| आबादी काफी पीछे छूट चुकी थी| विद्यापति को जोर की प्यास लगी लेकिन पानी का कहीं नामोनिशान नहीं था| उन्होंने उगना से कहा-‘ प्यास से मेरा गला सूख रहा है| जल्दी कहीं से पानी लाओ, अन्यथा मेरी जान नहीं बचेगी|’
उगना ने दूर-दूर तक नजरें दौड़ाईं| कहीं पानी नहीं दिखाई दे रहा था| उगना ने ध्यान से विद्यापति को देखा| ऐसा लग रहा था, मानो कुछ पल और पानी नहीं मिला तो उनकी जान चली जाएगी| उगना ने मन ही मन कुछ निश्चय किया| वह उस वटवृक्ष की आड़ में चला गया जिसकी छाँव में दोनो खड़े थे| पल भर बाद उगना लौटा तो उसके हाथ में पानी से लबालब लोटा था|
विद्यापति ने लोटा हाथों में ले लिया| लोटा को होठों से लगा ही रहे थे कि पानी की खुश्बू उनके नाक से टकराई| वे रुक गए| उन्होंने आश्चर्य से कहा – ‘यह तो गंगाजल है| यह तुम कहाँ से लाए?’
उगना जवाब देने में आनाकानी करने लगा| विद्यापति को कुछ शक हुआ| उन्होंने कहा – ‘जब तक तुम अपनी असलियत नहीं बताओगे, मैं यह पानी नहीं पीऊँगा|’
उगना फिर भी टालमटोल करता रहा| जब विद्यापति ने अपनी जिद नहीं छोड़ी तो उगना ने कहा-‘आप मेरी असलियत जानना चाहते हैं तो यह लीजिए|’
इतना कहते ही उगना अपने वास्तविक रूप में आ गया| विद्यापति सिहर गए|सामने साक्षात् महादेव खड़े थे| विद्यापति उनके पैरों पर गिर पड़े| मुँह से निकला-‘महादेव, आप हमारे घर?’ महादेव मुस्कुराए| बोले- ‘तुम्हारे गीत में ऐसा आकर्षण था कि मैं यहाँ खिंचा चला आया, तुम्हारे पास|’
‘मेरे गीत तो प्रेम का पर्याय भर है’- विद्यापति संकोच से उठते हुए बोले| ‘भगवन्, एक वचन दीजिए कि अब आप मुझे छोड़कर कभी नहीं जाएँगे|’
महादेव ने कुछ सोचा और कहा-‘ठीक है! मगर एक शर्त है कि यह रहस्य जिस दिन कोई तीसरा जान जाएगा, मैं वापस कैलाश पर्वत चला जाऊँगा|’
उस दिन के बाद विद्यापति जब भी पूजा करते, उगना की उपस्थिति पूजाघर में होती|
कुछ दिन बीत गए| एक दिन विद्यापति को राजदरबार जाना था| सवेरे पूजा समाप्ति के बाद विद्यापति तैयार होकर दरबार के लिए बिना खाए ही निकलने लगे| जलपान इसलिए नहीं बन सका था कि जलावन नहीं था| कविपत्नी गुस्से में थीं| गुस्सा उगना पर था| इसलिए कि उन्होंने शाम को ही जलावन लाने के लिए उगना को कह रखा था| विद्यापति निकल ही रहे थे कि उगना जलावन लिए लौटा| गुस्से में काँपती कविपत्नी ने जलावन के गठ्ठर में से एक लकड़ी खींची और उगना की पीठ पर दे मारी| यह देख विद्यापति हड़बड़ाकर बोल पड़े- ‘अरे! यह क्या कर रही हो? जानती हो यह कौन हैं?...साक्षात् महादेव हैं|’
इतना कहना था कि उगना गायब हो गया| उसका बटुआ और उसके कपड़े जमीन पर पड़े थे| विद्यापति बिलख पड़े| उनके विलाप से पूरी दुनिया रो पड़ी|
उगना रे मोर केतय गेलाह
कतय गेलाह शिव किदहुँ भेलाह
भांग ने बटुआ रुसि बैसलाहा...
उगना तो नहीं लौटा लेकिन उसके बिछोह में विद्यापति के मुँह से निकले गीत, न केवल मिथिलांचल में, अपितु देश दुनिया में गूँज रहे हैं|
-----डॉ लक्ष्मीकांत चौधरी ‘सजल’
Wednesday, September 5, 2012
Thursday, June 14, 2012
Tuesday, May 29, 2012
एक कहानी यह भी..- डॉ लक्ष्मीकांत चौधरी‘सजल’
हिन्दी दैनिक’आज’ मे प्रकाशित शिक्षानामा(२८
मई-१२)
- डॉ लक्ष्मीकांत ‘सजल’
उस दिन कम्पीटीशन था मेढकों के बीच.सो बड़ी संख्या में मेढक पहुँचे थे.पास-
पड़ोस के गढ्ढे तालाब से.और दूर दराज के गढ्ढे- तालाबों से भी. फुदक फुदक कर चलते
हुए.उनमें भाँति- भाँति के मेढक थे.छोटे- छोटे मेढक, मद्धम कद के मेढक और ढाबुस
भी.सभी मेढक जमा हुए पहाड़ी के नीचे तलहटी में.कुछ तो कम्पीटीशन में हिस्सा लेने
पहुँचे थे, बाकी दर्शक बन तमाशा देखने. कम्पीटीशन शुरू होने में देरी थी इसलिए सभी
उछल-कूद कर रहे थे.बच्चे उधम मचा रहे थे टर्र-टर्र कर. टर्र-टर्र तो बुजुर्ग भी कर
रहे थे लेकिन बच्चों को शांत करने के लिए.कम्पीटीशन में हिस्सा लेने वालों की
टरटराहट अलग किस्म की थी इसलिए कि वे काफी जोश में थे.मेढकों की टरटराहट से ऐसा लग
रहा था जैसे वे बारिश के इन्तेज़ार में हों.लेकिन उन्हें बारिश का इन्तेज़ार थोड़े
ही था.उन्हें तो कम्पीटीशन शुरु होने का इन्तेज़ार था.मेढकों के पहाड़ पर चढ़ने का
कम्पीटीशन, पहाड़ की चोटी पर पहुँचने का कम्पीटीशन .
खैर,नियत समय पर कम्पीटीशन शुरु हुआ.कम्पीटीशन में हिस्सा लेने वाले मेढक
पहाड़ पर चढ़ने लगे फुदकते हुए.अब बाकी मेढक साँस रोकर कर उन्हे देख रहे
थे,फुदक-फुदक कर पहाड़ की ऊँचाइयाँ तय करते हुए.कुछ तो चढ़ने के साथ ही लुढ़क कर
नीचे आ गिरे.जो चढ़ते जा रहे थे, उन्हें नीचे से शाबाशियाँ मिल रही थीं.प्रशंसा के
स्वर मिल रहे थे.जहाँ किसी और गढ्ढे या तालाब का मेढक आगे निकलता, नीचे जमा दूसरे
गढ्ढे या तालाब के मेढक उदास हो जाते.समय गुजरता गया और मेढक नीचे गिरते
गए.धीरे-धीरे तमाम मेढक नीचे आ गिरे.अब सिर्फ एक मेढक बचा था.वह फुदक-फुदक कर आगे
बढ़ा जा रहा था,ऊँचाइयाँ तय करते हुए.उसके सामने उसका लक्ष्य था.नीचे जमा तमाम
मेढक टकटकी लगाए उसे ही देख रहे थे, यह देखने के लिए कि वह कि वह अपने लक्ष्य तक
पहुँचता है या नहीं.नीचे से सभी उसका उत्साह बढ़ा रहे थे.आखिरकार उसने अपने लक्ष्य
को छू ही लिया.पहाड़ की चोटी पर पहुँचते ही उसने दोनों हाथ हिलाए, विजेता की
मुद्रा में.नीचे जमा सभी मेढक खुशी के मारे उछल पड़े.
वह नीचे उतरा तो उसे फूलमालाओं से लाद दिया गया.हर गढ्ढे तालाब के मेढक उसे
बधाई देने लगे.जो छोटी नदियों से आए थे वे भी बधाई देने लगे.लेकिन वह तो निर्विकार
था.इस तरह कि जैसे सुन ही नहीं रहा हो.बाद में पता चला कि वह मेढक बहरा था.
यह कहानी संपादक जी ने तब सुनाई जब उनकी पुस्तक रिलीज हो
रही थी.सो कहानी का सार यह है कि अगर वह मेढक बहरा नहीं होता तो अपने लक्ष्य तक
नहीं पहुँच पाता.बाकी मेढकों की तरह वह भी नीचे आ गिरा होता, अपने साथियों से आलोचना
या प्रशंसा के स्वर सुनकर.लक्ष्य को वही हासिल कर सकता है जिसे आलोचना या प्रशंसा
की चिंता न हो. उसे चिन्ता हो तो सिर्फ अपने लक्ष्य की.
डॉ लक्ष्मीकांत चौधरी ‘सजल’
व्याख्याता
Saturday, May 26, 2012
Friday, April 6, 2012
निराशा की घटा हटा के रखो(किशोरों के लिए):- ऋता शेखर ‘मधु’
धैर्य का दामन पकड़
के रखो,
सब्र की मुट्ठी जकड़
के रखो,
उम्मीदों के चिराग जला के रखो,
खुशियों के दीप
जगमग करेंगे|
निराशा की घटा हटा के
रखो,
प्यार की ज्योत जला के
रखो,
इच्छा की रंगोली सजा के रखो,
आनंद के सागर छलक
उठेंगे|
क्रोध की अग्नि बुझा के रखो,
वैर के बीज
सुखा के रखो,
बातों के तीर
छुपा के रखो,
हर्ष के पौधे
लहक उठेंगे|
प्रेम की धारा
बहा के रखो,
विश्वास की नींव जमा के रखो,
आशा की किरण जगा के रखो,
जीत के झंडे
लहर उठेंगे|
श्रम के मोती चमका के रखो,
लगन की लौ बचा
के रखो,
प्रयास की सीढ़ी लगा के रखो,
शौर्य के सूरज दमक उठेंगे||
ऋता शेखर ‘मधु’
Wednesday, March 21, 2012
बिहार दिवस
हाइगा’ जापानी पेण्टिंग की एक शैली है,जिसका शाब्दिक अर्थ है-’चित्र-कविता’ । हाइगा दो शब्दों के जोड़ से बना है …(‘‘हाइ” = कविता या हाइकु + “गा” = रंगचित्र चित्रकला) हाइगा की शुरुआत १७ वीं शताब्दी में जापान में हुई | उस जमाने में हाइगा रंग - ब्रुश से बनाया जाता था | लेकिन आज डिजिटल फोटोग्राफी जैसी आधुनिक विधा से हाइगा लिखा जाता है- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’-डॉ हरदीप कौर सन्धु, हिन्दी हाइकु एवं हिन्दी हाइगा से साभार http://hindihaiga.blogspot.in/ .
हाइकु, कविता लिखने की जापानी विधा है|
Sunday, March 18, 2012
कोयल की कूक
हाइगा’ जापानी पेण्टिंग की एक शैली है,जिसका शाब्दिक अर्थ है-’चित्र-कविता’ । हाइगा दो शब्दों के जोड़ से बना है …(‘‘हाइ” = कविता या हाइकु + “गा” = रंगचित्र चित्रकला) हाइगा की शुरुआत १७ वीं शताब्दी में जापान में हुई | उस जमाने में हाइगा रंग - ब्रुश से बनाया जाता था | लेकिन आज डिजिटल फोटोग्राफी जैसी आधुनिक विधा से हाइगा लिखा जाता है- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’-डॉ हरदीप कौर सन्धु, हिन्दी हाइकु एवं हिन्दी हाइगा से साभार http://hindihaiga.blogspot.in/ .
हाइकु, कविता लिखने की जापानी विधा है|
हाइकु, कविता लिखने की जापानी विधा है|
इसमें वर्णों का क्रम 5+7+5 होता है|
Friday, March 9, 2012
माँ क्या है - मोहम्मद शाहबाज़
![]() |
| मोहम्मद शाहबाज़ |
माँ क्या है
समंदर ने
कहा,
माँ एक ऐसी सीपी है,
जो औलाद की हजारो ऐब
छुपा लेती है|१|
बादल ने
कहा
माँ इन्द्रधनुष है,
जिसमे हर रंग समाया है|२|
माली ने
कहा,
माँ गुलशन का वह फूल है,
जिससे गुलशन सदा महकता रहता है|३|
औलाद ने
कहा
माँ ममता की अनमोल दास्तान है,
जो हर दिल पर कुर्बान है|४|
खुदा ने
कहा
माँ मेरे तरफ से अपने बन्दों
को एक हसीन तोहफा है|५|
नाम - मोहम्मद शाहबाज़ खान
वर्ग -०९
क्रमांक -७१
Sunday, February 19, 2012
कविता में हिसाब एवं वनस्पति शास्त्र--ऋता शेखर 'मधु'
कविता में हिसाब
कविता लिखा तो जाना
इसमें भी है भरा हिसाब
वर्ण मात्रा गिनते-गिनते
नींद उड़ी है सारी रात|
सत्रह वर्णों को गिनते
हाइकु का बनता खाका
ज्यूँ ही ये इकतीस बने
बन जाता वह ताँका|
ताँका आगे बढ़ता जाए
होता है वह चोका
तब जाकर भाव उतरता
अर्थ आता है चोखा|
सोलह-सोलह गिन-गिन
बनाया था चौपाई
एक मात्रा खिसक गया
चौपाई हाथ नहीं आई|
दोहा को जब आजमाया
बैठाया तेरह-ग्यारह
वह भी धोखा दे गया
हो गया नौ-दो-ग्यारह|
फिर भी कोशिश जारी है
लेखनी अभी न हारी है
प्रेरणाएँ बहुत सारी हैं
प्रोत्साहन की ही बारी है|
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
कविता में वनस्पति शास्त्र
ऐ पलाश और अमलतास
ओ प्यारे गुलमोहर
क्षमा कर दो तुम सब मुझे
सौन्दर्य तुम्हारा पहचाना नहीं
जब भी देखा मैंने तुम्हे
सिर्फ ‘बौटनी’ ही याद आई
तुम्हारा’किंगडम’ ‘फै़मिली’ जाना
‘जीनस’ ‘स्पीशीज़’ ही जान पाई
जब भी हरे पत्तों को देखा
‘फ़ोटोसिन्थेसिस’ याद आया
देख तुम्हारे पुष्पों को
झट ‘इनफ्लोरेशेंस’ ढूँढने लगी
‘पेटल्स’ ‘सेपल्स’गिना
‘एपीकैलिक्स’ देखने लगी
साहित्योद्यान में ज्यों रखा कदम
महत्व तुम्हारा जान गई
कवियों के दिल की धड़कन थे
सर्वत्र सिर्फ तुम ही तुम थे
अब दिखता है मुझको भी
तुम सब कितने सुन्दर हो
क्षमा कर दो सब भूल तुम
लेखनी में मेरी आ बसो तुम|
ऋता शेखर’मधु’
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